*मुक्त-मुक्तक : 539 - रफ़्ता-रफ़्ता तेज़ से भी................


रफ़्ता-रफ़्ता तेज़ से भी 
तेज़ चलती जा रही ॥
गर्मियों के बर्फ़ की 
मानिंद गलती जा रही ॥
सदियाँ लाज़िम हैं हमें और 
पास हैं बस चंद दिन ,
भर जवानी फ़िक्र में इस 
उम्र ढलती जा रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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