137 : मुक्त-ग़ज़ल - अंधे ने जैसे साँप को.........


अंधे ने जैसे साँप को रस्सी समझ लिया ॥
चश्मिश ने एक बुढ़िया को लड़की समझ लिया ॥
धागा पिरो दिया क्या एक बार सुई में ,
लोगों ने मुझको जात का दर्ज़ी समझ लिया ॥
न जाने किस अदा से बोझ ढो रहा था मैं ,
सब ही ने मुझको पेशेवर क़ुली समझ लिया ॥
अपने ही घर में झाड़ू लगाने की वजह से ,
मुझको नगर-निगम ने तो भंगी समझ लिया ॥
पीने से रोक क्या दिया दारू से अपने ही
बच्चों ने मुझको जन्म का बैरी समझ लिया ॥
वीराने में जवान बहिन-भाई देखकर ,
बहुतों ने उनको प्रेमिका-प्रेमी समझ लिया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (01-07-2014) को ""चेहरे पर वक्त की खरोंच लिए" (चर्चा मंच 1661) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! मयंक जी !
गज़ब हो गया ये तो !
धन्यवाद ! प्रतिभा सक्सेना जी !
Digamber Naswa said…
वाह ... गज़ब के शेर हैं सारे ... बहुत ही लजवाब और नए अंदाज़ की ग़ज़ल ... बधाई ...
धन्यवाद ! Digamber Naswa जी !

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