136 : मुक्त-ग़ज़ल - लापता गुमनाम हूँ..............


लापता - गुमनाम हूँ ॥
इस क़दर मैं आम हूँ ॥
प्यास से लबरेज़ मैं ,
और उनका जाम हूँ ॥
चाय से परहेज है ,
दार्जिलिंग आसाम हूँ ॥
गर्मियों में खौलती ,
भेड़ों का हज्जाम हूँ ॥
जिस्म में मछली के इक ,
चकवा तश्नाकाम हूँ ॥
अहमक़ औ नादान मैं ,
इल्म का अंजाम हूँ ॥
बिन दरो - दीवार का ,
अर्श जैसा बाम हूँ ॥
न हूँ सुब्हे - ज़िंदगी ,
न अजल की शाम हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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