134 : मुक्त-ग़ज़ल - यह भरोसा मुझको आख़िरकार ............


यह भरोसा मुझको आख़िरकार करना ही पड़ा ॥
इस ज़माने में नहीं पैसे-रुपये से कुछ बड़ा ॥
क़ीमतों की बात है सब कुछ बिकाऊ है यहाँ ,
जिस्म भी और प्यार भी,क्या दीन और ईमान क्या ?
फर्ज़ रखकर ताक पर सब हक़ की बातें कर रहे ,
जिसको देखो उसको चस्का मुफ़्तखोरी का लगा ॥
कामयाबी और बरबादी का अपना राज़ है ,
है कहीं कोशिश कहीं तक़दीर का है मामला ॥
अपनी वहशत,ज़ालिमाना हरकतों से सच कहूँ ,
आदमी के सामने शैतान भी फ़ीका पड़ा ॥
इस तरह से भी बहुत बिजली बचत हो जायेगी ,
धूप में जलते हुए बल्बों को हम गर दें बुझा ॥
बेचते हैं और पीते भी हैं खुल्लेआम जो ,
रखते हैं वो भी ख़िताब इस शहर में नासेह का ॥
इल्तिजा से बन्दगी से जब न कुछ हासिल हुआ ,
पहले सब कुछ था ख़ुदा अब कुछ नहीं उसका ख़ुदा ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-06-2014) को "यह किसका प्रेम है बोलो" (चर्चा मंच-1638) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
धन्यवाद ! मयंक जी..................
सचमुच कितनी बार हम देखते हैं कि जिनका काम है कि वह दिन होते ही स्ट्रीट लाइट बंद करें ुनको स भल की सजा मिलनी चाहिये।
Digamber Naswa said…
सटीक बातें हैं हर शेर में .... जल्दी नहीं समझे तो बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी ...
धन्यवाद ! आशा जोगलेकर जी !
धन्यवाद ! Digamber Naswa जी !

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