133 : मुक्त-ग़ज़ल - करवट बदल-बदल के..............


करवट बदल-बदल के हमने उनकी ख़बर की ॥ 
सब रात जाग-जाग कर ही आज बसर की ॥ 
ख़ुद की ख़बर नहीं है उसको जो ज़बान पर ,
रखता है ख़बर हर गली-कूचे की शहर की ॥ 
माँगे बग़ैर उसने न क्या-क्या अता किया !
चाही गई कभी न एक चीज़ नज़र की ॥ 
रहते हैं इस जहाँ में मगर फ़िक्र उनको है ,
जन्नत की या दोज़ख़ की या दुनिया से उधर की ॥ 
बाहर के वो शैतान भी जो पूज रहा है ,
घर के तो फ़रिश्तों की भी उसने न क़दर की ॥ 
बर्बादियों पे जब वो मेरी रोने आ गया ,
घड़ियाल के अश्कों की क़दर मैंने मगर की ॥ 
उसको न कुछ ख़याल ज़रूरत का हमारी ,
जिसकी थी पूरी हमने हर इक कोर-कसर की ॥ 
दुनिया की तो जा-जा के वो लेता है हर ख़बर ,
पुर्सिश को मेरी भूल के सूरत न इधर की ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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