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Showing posts from June, 2014

137 : मुक्त-ग़ज़ल - अंधे ने जैसे साँप को.........

अंधे ने जैसे साँप को रस्सी समझ लिया ॥ चश्मिश ने एक बुढ़िया को लड़की समझ लिया ॥ धागा पिरो दिया क्या एक बार सुई में , लोगों ने मुझको जात का दर्ज़ी समझ लिया ॥ न जाने किस अदा से बोझ ढो रहा था मैं , सब ही ने मुझको पेशेवर क़ुली समझ लिया ॥ अपने ही घर में झाड़ू लगाने की वजह से , मुझको नगर-निगम ने तो भंगी समझ लिया ॥ पीने से रोक क्या दिया दारू से अपने ही बच्चों ने मुझको जन्म का बैरी समझ लिया ॥ वीराने में जवान बहिन-भाई देखकर , बहुतों ने उनको प्रेमिका-प्रेमी समझ लिया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 561 - बज़्म में मस्जिद में या..........

बज़्म में मस्जिद में या फिर 
मैक़दा आया ॥ दोस्तों को साथ ले या 
अलहदा आया ॥ जाने क्यों लेकिन हमेशा 
वो ख़ुशी में भी , साफ़ नमदीदा बड़ा ही 
ग़मज़दा आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 560 - लाखों मातम में भी.........

लाखों मातम में भी जिगर जो 
न बिलख रोएँ ॥ जिस्म तोला हजारों रत्ती 
सर टनों ढोएँ ॥ देख हैराँ न हो यहाँ बगल में 
फूलों के , सैकड़ों नोक पे काँटों की 
मुस्कुरा सोएँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 559 - यों बुलायी अपने हाथों........

यों बुलायी अपने हाथों 
सबकी शामत ॥ बिल्लियों की देख चूहों 
से मोहब्बत ॥ अहमक़ों ने शेर के 
हाथों में अपने, भेड़ ,बकरों ,हिरनों की 
दे दी हिफाज़त ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

136 : मुक्त-ग़ज़ल - लापता गुमनाम हूँ..............

लापता - गुमनाम हूँ ॥ इस क़दर मैं आम हूँ ॥ प्यास से लबरेज़ मैं , और उनका जाम हूँ ॥ चाय से परहेज है , दार्जिलिंग आसाम हूँ ॥ गर्मियों में खौलती , भेड़ों का हज्जाम हूँ ॥ जिस्म में मछली के इक , चकवा तश्नाकाम हूँ ॥ अहमक़ औ नादान मैं , इल्म का अंजाम हूँ ॥ बिन दरो - दीवार का , अर्श जैसा बाम हूँ ॥ न हूँ सुब्हे - ज़िंदगी , न अजल की शाम हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-मुक्तक : 558 - बिना पर बाज से बेहतर..........

बिना पर बाज से बेहतर 
परिंदा मानने वालों ॥ मरे होकर हमेशा तक को 
ज़िंदा मानने वालों ॥ नहीं क्यों शर्म करते आख़री 
होकर करोड़ों में , हमेशा ख़ुद को दुनिया में 
चुनिंदा मानने वालों ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त-मुक्तक : 557 - अपने ही दफ्न को..........

अपने ही दफ्न को 
मरघट आए हुए ॥ ख़ुद का काँधों पे 
मुर्दा उठाए हुए ॥ देखिए बेबसी 
ये हमारी कि हम , खिलखिलाते हैं 
आँसू छिपाए हुए ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 556 - न पोर्च न बरामदा.............

न पोर्च न बरामदा 
न लान दोस्तों ॥ हरगिज़ न देखने में 
आलीशान दोस्तों ॥ जन्नत से कम नहीं है
 मगर मेरे वास्ते , घर मेरा बस दो कमरों का 
मकान दोस्तों ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त-मुक्तक : 555 - हुस्न की अब क्या तेरे................

हुस्न की अब क्या तेरे 
तारीफ़ में कहना ? लेक जब लब आ गई 
ख़ामोश क्यों रहना ? तेरे आगे मुफ़्त मिट्टी 
के सभी ढेले , तू खरे सोने का वज़्नी 
क़ीमती गहना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 554 - मंदिरों में मस्जिदों में रूहो.................

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मंदिरों में मस्जिदों में रूहो - दिल में जो ख़ुदा ॥ एक ही सब शक्लों में है ईश हो या वो ख़ुदा ॥ एक दिन हो जाएँगे ऐसे तो लाखों दोस्तों , कितना भी अच्छा हो इंसाँ उसको मत बोलो ख़ुदा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 553 - क्या मस्त मैंने उसकी............

क्या मस्त मैंने उसकी 
निगाहों को था पिया  ? उसने भी मेरा दीद 
हाथों हाथ ले लिया ॥  उठ ही रहा था दोनों 
तरफ से गरम धुआँ , जलने से पहले दुनिया ने 
हमको बुझा दिया ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 552 - समुंदरों से कम की.............

समुंदरों से कम की 
ये न थाह लेता है ॥ हुजूमे ग़म जहाँ हो 
दिल पनाह लेता है ॥ इसे है शौक़ जैसे 
काँटो पे ही सोने का , कभी न नींद को ये 
ख़्वाबगाह लेता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 551 - अपने हुनर-ओ-फ़न का.........

अपने हुनर-ओ-फ़न का 
पूरा करके इस्तेमाल ॥ उसने दिखाया हमको इक 
बहुत बड़ा क़माल ॥ कल तक वो पैसे-पैसे का 
मोहताज,नामचीन बन बैठा आज रातों रात 
अमीर मालामाल ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 550 - पोखर के गंदे पानी को.............

पोखर के गंदे पानी को 
कह डाल गंगा-जल ॥ खुर जैसे पंजों को भी तू 
कह ले चरण-कमल ॥ पर चापलूस ये तो 
ख़ुशामद की हद ही है , मतलब को तू गधे से 
बाप को करे बदल !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 549 - जो भी थे मुझमें छिन गए.......

जो भी थे मुझमें छिन गए 
वो सब हुनर कमाल ॥  जितना था तेज़गाम 
उतना अब हूँ मंद चाल ॥  कितना कहा था सबने 
रहना बचके इश्क़ से , अपने ही हाथों कर ली 
अपनी ज़िंदगी मुहाल ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 548 - शाह होकर चोर की................

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शाहहोकरचोरकीमानिंदक्योंछुप-छुपरहे? चहचहाएक्योंनहींरखकरज़ुबाँचुप-चुपरहे? राज़क्याहैजबकिअपनेआपमेंइकनूरतुम_ क्योंतुमअपनीतहमेंक़ायमरखअँधेराधुप

*मुक्त-मुक्तक : 547 - तक्लीफ़ पे तक्लीफ़...........

तक्लीफ़ पे तक्लीफ़ 
दर्द _दर्द पे दिया ॥ जो भी दिया था तुमने 
हाथों हाथ उसे लिया ॥ तुम जैसा न शौक़ीन-ए-ग़म 
कि दिल ही दिल में रो , हँस – हँस के सितम झेले 
सब कभी न उफ़ किया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 546 - उसके अंदर में क्या...............

उसके अंदर में क्या  मंजर दिखाई देता है ? बिखरे कमरे से सिमटा 
घर दिखाई देता है ॥ जबसे सीखी है बिना 
शर्त परस्तिश उसने , बंदा बेहतर से भी 
बेहतर दिखाई देता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 545 - जितना कहते हैं वो..................

जितना कहते हैं वो 
उतना कभी नहीं करते ॥ और जिस वक़्त पे 
कहते तभी नहीं करते ॥  आज का काम कल पे 
टालने के आदी हैं , कुछ भी अब का वो भूले 
भी अभी नहीं करते ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 544 - डर के साये में कुछ..................

डर के साये में कुछ इस तरह बसर 
होती है ॥ लब उठाए हँसी तो आँख अश्क़ 
ढोती है ॥ दिल तो रहता है उनींदा ही 
उबासी लेता , अक़्ल भी बेच-बेच कर के घोड़े 
सोती है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 543 - पीते हैं वो तो कहते हैं................

पीते हैं वो तो कहते हैं 
करते हैं ग़म ग़लत ॥ हम छू भी लें तो बोलेंगे 
करते हैं हम ग़लत ॥ हालात उनसे इस क़दर 
ख़राब हैं अपने , हमको तो ये लगता है कि 
चलता है दम ग़लत ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 542 - उजड़े इक गाँव से वो..............

उजड़े इक गाँव से वो 
सद्र-शहर बन बैठा ॥ ढीला अंडा था 
परिंदा-ए-ज़बर बन बैठा ॥ बिलकुल उम्मीद नहीं 
जिसके थी पनपने की , देखते-देखते वो 
पौधा शजर बन बैठा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 541 - सच कहा लेकिन अधूरा...................

सच कहा लेकिन अधूरा 
चाहे जिसने कह दिया ॥ कितने-कितने,इसने-उसने,
जिसने-तिसने कह दिया ॥ और भी हैं ढेरों ज़िम्मेदारियाँ 
इससे अहम , है जवानी इश्क़ को ही 
तुझसे किसने कह दिया ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 540 - क़ुदरत ने तो बख़्शा था................

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क़ुदरत ने तो बख़्शा था हुस्न ख़ूब-लाजवाब ॥ जंगल घने थे झीलें लबालब नदी पुरआब ॥   किसने ज़मीन उजाड़ी है पेड़ों को काट-काट ? हम ही ने सूरत इसकी बिगाड़ी है की ख़राब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

135 : मुक्त-ग़ज़ल - यूँ ही सा देखने में है..............

यूँ ही सा देखने में है वो छोटा सा बड़ा इंसाँ ॥ सभी को बैठने कहता है ख़ुद रहकर खड़ा इंसाँ ॥ जहाँ सब लोग उखड़ जाते हैं पत्ते-डाल से , जड़ से , वो टस से मस नहीं होता पहाड़ों सा अड़ा इंसाँ ॥ वो अंदर से है मक्खन से मुलायम आज़मा लेना , यों दिखता है वो ऊपर नारियल जैसा कड़ा इंसाँ ॥ नहीं मिलता कहीं दो घूँट जब पानी मरुस्थल में , वहाँ ले आ पहुँचता है वो पानी का घड़ा इंसाँ ॥ जो सोता बेचकर घोड़े वो उठ जाता है बाँगों से , नहीं उठता है आँखें खोलकर लेटा , पड़ा इंसाँ ॥ यों जुड़ता है किसी से जैसे उसका ही वो टुकड़ा हो , क़रीने से अँगूठी में नगीने सा जड़ा इंसाँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 539 - रफ़्ता-रफ़्ता तेज़ से भी................

रफ़्ता-रफ़्ता तेज़ से भी 
तेज़ चलती जा रही ॥ गर्मियों के बर्फ़ की 
मानिंद गलती जा रही ॥ सदियाँ लाज़िम हैं हमें और 
पास हैं बस चंद दिन , भर जवानी फ़िक्र में इस 
उम्र ढलती जा रही ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

134 : मुक्त-ग़ज़ल - यह भरोसा मुझको आख़िरकार ............

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यह भरोसा मुझको आख़िरकार करना ही पड़ा ॥ इस ज़माने में नहीं पैसे-रुपये से कुछ बड़ा ॥ क़ीमतों की बात है सब कुछ बिकाऊ है यहाँ , जिस्म भी और प्यार भी,क्या दीन और ईमान क्या ? फर्ज़ रखकर ताक पर सब हक़ की बातें कर रहे , जिसको देखो उसको चस्का मुफ़्तखोरी का लगा ॥ कामयाबी और बरबादी का अपना राज़ है , है कहीं कोशिश कहीं तक़दीर का है मामला ॥ अपनी वहशत,ज़ालिमाना हरकतों से सच कहूँ , आदमी के सामने शैतान भी फ़ीका पड़ा ॥ इस तरह से भी बहुत बिजली बचत हो जायेगी , धूप में जलते हुए बल्बों को हम गर दें बुझा ॥ बेचते हैं और पीते भी हैं खुल्लेआम जो , रखते हैं वो भी ख़िताब इस शहर में नासेह का ॥ इल्तिजा से बन्दगी से जब न कुछ हासिल हुआ , पहले सब कुछ था ख़ुदा अब कुछ नहीं उसका ख़ुदा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 538 - ऐसा करूँ धमाल...............

ऐसा करूँ धमाल –
धूम सालगिरह पे ॥ ऐसा दिखाऊँ रक़्स 
झूम सालगिरह पे ॥ इतना हूँ ख़ुश कि आज तो 
जी है अदू के भी , जाकर के लिपट जाऊँ 
चूम सालगिरह पे ॥ ( अदू = शत्रु , दुश्मन ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक 537 - ताउम्र कराहों की न ................

ताउम्र कराहों की न 
आहों की सज़ा दो ॥ मत एक भूल पर सौ 
गुनाहों की सज़ा दो ॥ जूतों को छीन-फाड़ दो 
टाँगें तो न काटो , चाहो तो बबूलों भरी 
राहों की सज़ा दो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 536 - मत कह बबूल मुझको.............

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मत कह बबूल मुझको छोटा हूँ बेर से भी ॥ झूठा हूँ बालकों सा लेकिन नहीं फ़रेबी ॥ खंभों की तरह मैंने माना नहीं हूँ सीधा , मत कर मगर मुनादी दावे से हूँ जलेबी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति