*मुक्त-मुक्तक : 520 - जबसे आया है ख़यालों में................


जबसे आया है ख़यालों में 
खुलापन मेरे II
ज़र्द पत्तों में निखर आया 
हरापन मेरे II
वक़्त-ए-रुख्सत है मगर 
देखो हरक़तें मेरी ,
भर बुढ़ापे में छलकता है 
लड़कपन मेरे  II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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