*मुक्त-मुक्तक : 516 - स्याह राहों में चमकते................


स्याह राहों में चमकते 
रहनुमा महताब सी II
तपते रेगिस्तां में प्यासों 
को थी ठन्डे आब सी II
उसका दिल लोगों ने जब 
फुटबॉल समझा , हो गयी
उसकी गुड़-शक्कर ज़बां भी 
ज़हर सी , तेज़ाब सी II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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