132 : मुक्त-ग़ज़ल - तंग तनहाई के............


तंग तनहाई के , बैठा था , क़ैदखाने से II
आ गई तू कि ये जाँ बच गई है जाने से II
यूँ तो पहले भी थी गुलशन में ये बहारें पर ,
ख़ार भी फूल हुए तेरे खिलखिलाने से II
भूल जाने के जतन छोड़ना पड़े आख़िर ,
याद आती है बहुत और तू भुलाने से II
मैं तड़पता था बिछड़कर के तुझसे रोता था ,
अब ख़ुशी से ही मरा जाऊं तेरे आने से II
एक सूरज की ज़रूरत है दोस्तों मुझको ,
ढेर चाँदों का , है क्या फ़ायदा लगाने से II
-डॉ.हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (18-04-2014) को "क्या पता था अदब को ही खाओगे" (चर्चा मंच-1586) में अद्यतन लिंक पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Vaanbhatt said…
सटीक अभिव्यक्ति...
धन्यवाद ! राजिव कुमार झा जी !

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