131 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ को नटखट वो शरीर...........


कुछ को नटखट , शरीर और चुलबुली लगती II
कुछ को संजीदा वो ,सीधी भी औ भली लगती II
कुछ को लगती है सुपारी सी नारियल सी कभू ,
कुछ को गुलज़ार के कचनार की कली लगती II
उसका हर अंग जैसे नाप-तौल कर हो बना ,
अज सरापा वो किसी साँचे में ढली लगती II
वैसे औलाद है वो इक ग़रीब की लेकिन ,
कुछ अदाओं से अमीरों के घर पली लगती II
उसकी घुंघरू सी हँसी में हैं खनकें ज्यों कंगन ,
नर्म आवाज़ रेशमी औ मखमली लगती II
दोस्तों को तो हमेशा है वो पैग़ामे-अमन ,
दुश्मनों को सदा ही ख़बरे ख़लबली लगती II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Surender Saini said…
Bahut sunder...................dil ko chhu lene wali.
धन्यवाद ! Surender Saini जी !
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (11-04-2014) को "शब्द कोई व्यापार नही है" (चर्चा मंच-1579) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Meena Pathak said…
बहुत खूब

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