130 : मुक्त-ग़ज़ल - है आग कभी पानी..............


है आग कभी पानी II
मेरी ये ज़िन्दगानी II
जो कुछ है पास अपने ,
सब रब की मेहरबानी II
कितना सम्हालिएगा ,
दौलत है आनी-जानी II
तुमको क्या सेव करना ,
हो याद मुँहज़ुबानी II
जैसे हो जोक कोई ,
ऐसी मेरी कहानी II
जब सर्च की तो पाया ,
ग़म ही है शादमानी II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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