128 : मुक्त-ग़ज़ल - दिलचस्प नहीं दर्दनाक............


दिलचस्प नहीं दर्दनाक साफ़बयानी  II
मैं हूँ जहाँ वहाँ पे पहुँचने की कहानी II
सूरत ही सबने देखी न देखा किसी ने दिल ,
इज्ज़त बहुत मिली न मिला इश्क़ेरूहानी II
चढ़ते को अस्सलाम लुढ़कते को अँगूठा ,
सदियों से भी आदत है ये लोगों की पुरानी II
कुछ कर कि गुज़र कर न ज़िन्दगी में दुबारा ,
आयेंगे कभी जोम , न जोबन न जवानी II
गड्ढे तमाम करके भी आख़िर रहे प्यासे ,
खोदा जब एक गहरा कुआँ तब मिला पानी II
हर हाल में होती है बुरी मैक़शी मगर ,
जब तक न फुंका था जिगर ये बात न मानी II
वो एक के बाद एक मुझको देते रहे ग़म ,
मैं लेता रहा जान मोहब्बत की निशानी II
उसको ही चाहा जिसका न होना था मेरा तय ,
समझा नहीं ये प्यार था कि हेचमदानी II
( हेचमदानी = मूर्खता , अज्ञान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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