127 : मुक्त-ग़ज़ल - उसके इश्क़ में बेशक मैनें...............


उसके इश्क़ में बेशक मैनें जीस्त को खोया था ॥ 
लेकिन जन्नत भी तो जीते जी ही पोया था ॥ 
उसका क्यों अहसान न मानूँ गिन-गिन शुक्र करूँ ?
जिसने ख़ुद को मार मिटा कर मुझको बनोया था ॥ 
कुछ तो सबब होगा ही जहाँ सब सज्दा करते हैं ,
एक अकेले मैनें ही क्यों सर न झुकोया था ?
आँख ने मेरी अश्क का इक कतरा भी न टपकाया ,
हिज्र में उसके दिल ये मगर दरिया भर रोया था ॥ 
ये भारी-भरकम पत्थर क्यों मुझको रुई न लगें ?
बचपन से ही मैनें सिर जो लोहा ढोया था ॥ 
रूह को भी अब अपनी काँटों पर आराम मिले
जिस्म मुलायम बिस्तर पे जो गाह न सोया था ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

waah ...bahut khoob ...
धन्यवाद ! रश्मि शर्मा जी !
धन्यवाद ! डॉ.निशा महाराना जी !

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