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Showing posts from April, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 530 - यूँ तो कभी हम आँख............

यूँ तो कभी हम आँख को अपनी 
भूले न नम करते हैं II और ज़रा सी , छोटी सी बातों 
पर भी न ग़म करते हैं II हम न तड़पते ग़ैर जिगर में 
तीर चुभोते तब भी , होती बड़ी तक्लीफ़ है तब जब 
अपने सितम करते हैं II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 529 - जब अपना ख़्वाब टूटा.............

जब अपना ख़्वाब टूटा 
बड़ा दिल का ग़म बढ़ा II तब मरते कहकहों का 
यकायक ही दम बढ़ा II जीने को और-और भी 
मरने लगे अपन , जब ज़ुल्म ज़िन्दगी पे हुआ 
जब सितम बढ़ा II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 528 - कोयल-कुहुक से काक-..................

कोयल-कुहुक से काक-
काँव-काँव से पूछो II इन झूठे शह्रों से न 
गाँव-गाँव से पूछो II मेरी सचाई की जो 
चाहिए गवाहियाँ , हर-धूप-चाँदनी से 
छाँव-छाँव से पूछो II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

132 : मुक्त-ग़ज़ल - तंग तनहाई के............

तंग तनहाई के , बैठा था , क़ैदखाने से II आ गई तू कि ये जाँ बच गई है जाने से II यूँ तो पहले भी थी गुलशन में ये बहारें पर , ख़ार भी फूल हुए तेरे खिलखिलाने से II भूल जाने के जतन छोड़ना पड़े आख़िर , याद आती है बहुत और तू भुलाने से II मैं तड़पता था बिछड़कर के तुझसे रोता था , अब ख़ुशी से ही मरा जाऊं तेरे आने से II एक सूरज की ज़रूरत है दोस्तों मुझको , ढेर चाँदों का , है क्या फ़ायदा लगाने से II -डॉ.हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 527 - घिनौने फूल को सुन्दर...............

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घिनौने फूल को सुन्दर गुलाब कौन करे ?
कि ठहरे नाले को बहती चनाब कौन करे ? लिखे हैं मैनें जो बिखरे भले-बुरे से सफ़े , उन्हें समेट के अच्छी किताब कौन करे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 526 - ना ज़रुरत से ज़ियादा..............

ना ज़रुरत से ज़ियादा न 
कम मनाने का II चलते-चलते न खड़े हो न 
थम मनाने का II इतना मस्रूफ़ रहें 
नापसंद कामों में , हमको मिलता ही नहीं 
वक़्त ग़म मनाने का II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 525 - क्या वाँ यहाँ क्या सारे ही..................

क्या वाँ यहाँ क्या सारे ही
 जहान में पड़े II ख़ालिस दिखावे झूठ-मूठ 
शान में पड़े II औरों की नाँह अपनी ही 
वजह कमाल है , ऊँचे से ऊँचे लोग भी 
ढलान में पड़े II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 524 - तिल-ख़ुशी से आस्मां.............

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तिल-ख़ुशी से आस्मां सा दूर हूँ II ताड़-ग़म सीने में ढो-ढो चूर हूँ II पूछ मत मेरी मियादे ज़िन्दगी , यूँ समझ ले इक खुला काफ़ूर हूँ II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 523 - जो कर रहा है तू वो...............

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जो कर रहा है तू वो गुनह है ज़लाल है मरने का ग़म नहीं है मुझे ये मलाल है मैं तुझको सरपरस्त समझता था तू मगर , अपने ही हाथों कर रहा मुझको हलाल है
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 522 - तल्लीन हो , तन्मय हो..........

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तल्लीन हो , तन्मय हो स्वयं को भी भूल हम II पलकों से पहले चुनते थे सब काँटे-शूल हम II आते थे वो जिस राह से फिर उसपे महकते , हाथों से बिछाते थे गुलाबों के फूल हम II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

131 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ को नटखट वो शरीर...........

कुछ को नटखट , शरीर और चुलबुली लगती II कुछ को संजीदा वो ,सीधी भी औ’ भली लगती II कुछ को लगती है सुपारी सी नारियल सी कभू , कुछ को गुलज़ार के कचनार की कली लगती II उसका हर अंग जैसे नाप-तौल कर हो बना , अज सरापा वो किसी साँचे में ढली लगती II वैसे औलाद है वो इक ग़रीब की लेकिन , कुछ अदाओं से अमीरों के घर पली लगती II उसकी घुंघरू सी हँसी में हैं खनकें ज्यों कंगन , नर्म आवाज़ रेशमी औ’ मखमली लगती II दोस्तों को तो हमेशा है वो पैग़ामे-अमन , दुश्मनों को सदा ही ख़बरे ख़लबली लगती II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

130 : मुक्त-ग़ज़ल - है आग कभी पानी..............

हैआगकभीपानीII मेरीयेज़िन्दगानीII जोकुछहैपासअपने , सबरबकीमेहरबानीII कितनासम्हालिएगा , दौलतहैआनी-जानीII तुमकोक्यासेवकरना , हो

*मुक्त-मुक्तक : 521 - इक नज़र गौर से देखो..........

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इक नज़र गौर से देखो जनाब की सूरत II दिल फटीचर है मगर रुख नवाब की सूरत II कैक्टस है वो कड़क ठोस ख़ुशनसीबी से , पा गया खुशनुमा नरम गुलाब की सूरत II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 520 - जबसे आया है ख़यालों में................

जबसे आया है ख़यालों में 
खुलापन मेरे II ज़र्द पत्तों में निखर आया 
हरापन मेरे II वक़्त-ए-रुख्सत है मगर 
देखो हरक़तें मेरी , भर बुढ़ापे में छलकता है 
लड़कपन मेरे  II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 519 - सब ख़ुशी से दूँगा सचमुच..............

सबख़ुशीसेदूँगासचमुच
अपनामनमानातोले II
तुझकोचाहाइसख़ताका
मुझसेहर्जानातोले II ढूँढताहूँतुझकोअपना
सरहथेलीपरलिए , तूदेतोहफ़ा--दिल
मेरायेनजरानातोले II -डॉ

*मुक्त-मुक्तक : 518 - दिखने में साफ़-सुथरे...................

दिखने में साफ़-सुथरे 
बीने-छने हुए थे II लगते थे दूर से वो 
इक-इक चुने हुए थे II ख़ुश थे कि दोस्त बनियों 
ने दाम कम लगाए , घर आके पाया सारे 
गेहूँ घुने हुए थे II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 517 - सब दिल के भोले मुझको...............

सबदिलकेभोलेमुझको
बदमाशनज़रआयें ? तर्रारचुपमुज़र्रद
अय्याशनज़रआयें ? कभीमुझकोमुर्देलगने
लगतेहैंसोयेसेक्यों ? क्योंसोयेलोगमुझको
कभी

*मुक्त-मुक्तक : 516 - स्याह राहों में चमकते................

स्याह राहों में चमकते 
रहनुमा महताब सी II तपते रेगिस्तां में प्यासों 
को थी ठन्डे आब सी II उसका दिल लोगों ने जब 
फुटबॉल समझा , हो गयी उसकी गुड़-शक्कर ज़बां भी 
ज़हर सी , तेज़ाब सी II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

129 : मुक्त-ग़ज़ल - यूँ दर्द से छटपटा..............

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यूँदर्दसेछटपटारहाहूँI मैंज़िंदगानीघटारहाहूँI चखाहीमैनेंकभीनखाया , मगरकहेंसबचटारहाहूँI मैंसेबहोकरभीउस