121( ¡¡ ) : मुक्त-ग़ज़ल - मत और किसी के खेल..................

मत और किसी के खेल संग में तो मानूँ होली !!
तू मुझको भिगो मैं तुझको रंग में तो मानूँ होली !!
मैं तुझको भरे बैठा हूँ कबसे ठूँस-ठूँस मन में ,
तू मुझको भरे जब हृदय अंग में तो मानूँ होली !!
मैं राह कोई भी अपनाऊँ पाने की तुझे सजनी ,
सब वैध रहें यदि प्रेम-जंग में तो मानूँ होली !!
लिख लाख पत्र पे पत्र किन्तु जो अभिवान्छित मुझको ,
लिखे तू अनंग लेख इक उमंग में तो मानूँ होली !!
पीते हैं तेरे हाथों से सदा पर प्यार भी दे अपना ,
यदि घोंट-घोंट कर आज भंग में तो मानूँ होली !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

expression said…
बेहतरीन ग़ज़ल...होली की शुभकामनाएं
सादर
अनु
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (18-03-2014) को "होली के रंग चर्चा के संग" (चर्चा मंच-1555) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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रंगों के पर्व होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
mahesh soni said…
बहुत ही शानदार..
mukeshjoshi said…
अतिसुन्दर हे होली की शुभ कामनाए''
धन्यवाद ! Ramkaran Prajapati जी !

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