मुक्त मुक्तक : ख़फ़ा ख़फ़ा


  कोई न जाने किस लिए वो रह रहा ख़फ़ा ?
  हर वक्त मुँह बिसूर बस रहे पड़ा ख़फ़ा ।।
  माहौल जबकि हर तरफ़ है उसके ख़ुशनुमा ,
  फिर भी वो अपने आप से लगे ख़फ़ा ख़फ़ा ।।
  इक हम हैं जो घसीटे जा रहे हैं बाँध कर ,
  ले नर्म नर्म नंगे पाँव दूर काँटों पर ,
  तक्लीफ़ोग़म में रात दिन गुजारते हैं सच ,
  फिर भी तो ज़िंदगी से हैं न हम ज़रा ख़फ़ा !!
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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