*मुक्त-मुक्तक : 512 - कोई हू-ब-हू तो.................


कोई हू-ब-हू तो 
कोई टुक जुदा है II
सभी का ख़ुदा ख़ास-
ओ-अलहदा है II
ये सोचूँ कि ज्यों तेरा 
मेरा है क्या यूँ ही ,
सबके ख़ुदा का भी 
होता ख़ुदा है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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