*मुक्त-मुक्तक : 510 - कह पाओ रू-ब-रू न...................


कह पाओ रू-ब-रू न 
नाजुक-ओ-नरम दिल के II
संगदिल भी जिनको पढ़के 
हो जाएँ रहम दिल के II
पैग़ामे मोहब्बत वो 
भेज ऐसे कबूतर से ,
क़रतास पे वो कर सब 
जज़्बात रक़म दिल के II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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