*मुक्त-मुक्तक : 504 - पाँव की तह की ज़मीं.............


पाँव की तह की ज़मीं 
और न सर की छत या छाँव ॥
मुल्क़ लगते हैं नहीं 
लगते सूबे , शहर या गाँव ॥
इसका चस्का है ख़तरनाक 
कोई खेले फिर ,
छोटे-मोटे नहीं 
चलते हैं सियासत में दाँव ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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