*मुक्त-मुक्तक : 502 - ऐ झुरमुट एक बार ............




ऐ झुरमुट एक बार 
पेड़-झाड़ से तू मिल ॥
ओ ऊँट इक दफ़ा किसी 
पहाड़ से तू मिल ॥
हैं इस जहाँ में एक से 
इक ऊँचे लोग-बाग ,
खिड़की कभी तो दुर्ग के 
किवाड़ से तू मिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-03-2014) को मिली-भगत मीडिया की, बगुला-भगत प्रसन्न : चर्चा मंच-1549 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Asha Saxena said…
सच बयां करता मुक्तक |

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