*मुक्त-मुक्तक : 500 - बेशक़ ही ख़्वाब...............


बेशक़ ही ख़्वाब बुनने पे 
कोई रोक नहीं है ॥
अरमान सजाने पे टुक भी 
टोक नहीं है ॥
इन बुलबुलों को दुनिया की 
फूँकों से बचाना ,
वरना जगत में इससे 
विकट शोक नहीं है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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