*मुक्त-मुक्तक : 495 - ग़म-ए-दिल का दिल.............


ग़म-ए-दिल का दिल ही दिल में 
र्द सहने को ॥
हम बहुत मज़बूर थे
 चुपचाप रहने को ॥
लोग सब सुनने हमें 
तैयार बैठे थे ,
पास में अपने न थे 
अल्फ़ाज़ कहने को ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Kailash Sharma said…
बहुत ख़ूबसूरत...

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