126 : मुक्त-ग़ज़ल - पहले सी हममें तुममें..............


पहले सी हममें तुममें मोहब्बत न अब रही II
इक दूसरे की दिल में वो इज्ज़त न अब रही II
गिन्नी में औ’’ दीनार में तुलते थे पहले हम ,
धेले की कौड़ी भर की भी क़ीमत न अब रही II
इक दूसरे के बिन कभी रहना न था मुमकिन ,
इक दूसरे की कोई ज़रूरत न अब रही II
मुद्दत से सो रहे हैं काँटों , पत्थरों पे हम ,
मखमल के बिस्तरों की वो आदत न अब रही II
इतना किया है हमने मुश्किलों का सामना ,
कोई भी मुसीबत हमें आफ़त न अब रही II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !
Yoginder Singh said…
बहुत ही सुंदर और शानदार है आपकी ये रचना ...........................
धन्यवाद ! Yoginder Singh जी !

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