125 : मुक्त-ग़ज़ल - लेकर के अपने साथ..............


लेकर के अपने साथ तेज़-तुंद हवाएँ
 II
सूरज के रिश्तेदार चिराग़ों को बुझाएँ II
ख़्वाबीदा आदमी तो आप उठ ही जायेगा ,
आँखें जो खोल सोये उनको कैसे जगाएँ ?
मंदिर का हर इक शख्स कलश बनने को तैयार ,
बुनियाद के पत्थर के लिए किसको मनाएँ ?
कितना अज़ीज़ हो कोई उसकी भी घर में लाश ,
रखता न कोई दफ्न करें सब या जलाएँ II
महँगी से महँगी भी शराब मुफ़्त क्यों न हो ,
समझें जो हराम इसको कभी मुँह न लगाएँ II
ख़ूब आज़माया अपना असर लाके रही हैं ,
अपनों की बद्दुआएँ औ ग़ैरों की दुआएँ II
यों बाप को भी सिज़दा करने में वो झिझकते ,
मतलब को तलवे ग़ैरों के चाटें औ दबाएँ II
मुझको न गुनहगारों की आज़ादियाँ अखरें ,
दिल रोता है जब झेलते मासूम सज़ाएँ II
यों धूप में मशालें सरासर फ़िजूल हैं ,
अच्छा हो अंधेरों में इक चिराग़ जलाएँ II
जब उनको ख़ुदा के वजूद पर यकीं नहीं ,
फिर किससे किया करते हैं दिल में वो दुआएँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (25-03-2014) को "स्वप्न का संसार बन कर क्या करूँ" (चर्चा मंच-1562) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
कामना करता हूँ कि हमेशा हमारे देश में
परस्पर प्रेम और सौहार्द्र बना रहे।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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