मुक्त ग़ज़ल : 124 - रोते-रोते हो गईं जब मुद्दतें..........



रोते-रोते हो गईं जब मुद्दतें II
तब लगाईं हमने हँसने की लतें II
कुछ को मिल जाता है सब कुछ मुफ़्त में ,
कुछ को कुछ मिलता न भर-भर क़ीमतें II
एक जैसी हरक़तों के बावजूद ,
कुछ को मिलते नर्क कुछ को जन्नतें II
देखकर मंजिल पे लंगड़ों की पहुँच ,
पैर वाले कर रहे हैं हैरतें II
उनकी खोटी ही रही नीयत सदा ,
पर खरी उनको मिलीं सब बरक़तेंII
पहले थीं चोरों से गुण्डों से मगर ,
अब पुलिस से हो रही हैं दहशतें II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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धन्यवाद ! संगीता पुरी जी !
वाह खूब कहा

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