मुक्त ग़ज़ल : 123 - सोचा न था वक़्त आयेगा............




सोचा न था वक़्त आयेगा ऐसा ख़राब भी ॥ 
खाएँगे पण्डे गोश्त पियेंगे शराब भी  
वो जो किया करते थे गुसल दूध दही से ,
आज उनको न दो घूँट मयस्सर है आब भी  
मिलते नहीं हैं उनको फूल कागज़ी भी आज ,
रौंदे थे जिनने कल जुही-चम्पे-गुलाब भी  
कुछ ब्योरे करेंगे तलब सुई के , बूँद के ,
कुछ लेंगे न तलवार औ’’ नदी के हिसाब भी  
क़ुदरत का निजाम अब तो आदमी सा हो गया ,
सहरा में बरसते नहीं काले सहाब भी  
है ज़िन्दगी का इल्म हमसे बेहतर उन्हें ,
आता भले ही उनको न पढ़ना किताब भी  
भर-भर गिलास पीना दवा का भी ज़हर हो ,
इक चमची पीजिये तो दवा है शराब भी ॥ 
आया ख़याल जब से हज का तब से बिल्लियाँ
कहती फिरें न अब तकें छिछड़ों के ख़्वाब भी  
बदमाश ही न , जुर्म तो कर बैठें कई बार ,
हालात से मज्बूर हो आली जनाब भी  
गर्मी में लगे जान का दुश्मन जो वो लगे ,
सर्दी में भला दोपहर का आफ़ताब भी ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुंदर प्रस्तुति.
इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 22/03/2014 को "दर्द की बस्ती":चर्चा मंच:चर्चा अंक:1559 पर.

धन्यवाद ! राजीव कुमार झा जी !
Alka Gupta said…
वाह्ह्ह्हह्ह्ह्ह बहुत खूब
धन्यवाद ! अलका गुप्ता जी !

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