122 : मुक्त-ग़ज़ल - मुँह बनाकर मत उन्हें कुछ................

    
    मुँह बनाकर मत उन्हें कुछ 
    मुस्कुराकर देखना ॥ 
    अपने रूठों को किसी दिन 
    यूँ मनाकर देखना ॥ 
    हमने माना कि तेरे 
    हम्माम का सानी नहीं ,
    फिर भी इक दिन खुल के बारिश 
    में नहाकर देखना ॥ 
    वो तुझे बेज़ायका 
    लगता है उसको इक दफ़ा ,
    सिर्फ़ तगड़ी भूख लगने 
    पर तू खाकर देखना ॥ 
    गोश्त हड्डीदार तू 
    हलुए सरीखा चाब ले ,
    एक रूखी-सूखी रोटी 
    भी चबाकर देखना ॥ 
    घंटों जिम में वेटलिफ्टिंग 
    तू किया करता है रोज़ ,
    एक दिन परिवार का 
    ज़िम्मा उठाकर देखना ॥ 
    टूट पड़ते फाकाकश को 
    देख जूठन पे न हँस ,
    एक दिन तू निर्जला 
    चुपके बिताकर देखना ॥ 
    -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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