121 : मुक्त-ग़ज़ल - रह गया है परिंदा तो................


   रह गया है परिंदा तो अब नाम भर ॥
   पर तो सय्याद ने सब दिये हैं कतर ॥
   खाद-पानी से महरूम बंजर ज़मीं ,
   कैसे होगा कोई बीज वाँ पे शजर ?
   बस दरिंदों , फ़रिश्तों का रहवास है ,
   शह्र में आदमी के न बसते बशर ॥
   कहते थकते न थे इश्क़ को हम ख़ुदा ,
   कैसे बोलें इसी मुँह से अब हम क़हर ॥
   प्यार दे मत ब- क़द्रे- ज़रूरत सही ,
   क़ाबिले दाद हूँ थोड़ी इज्ज़त तो कर ॥
   इश्तेहार अपने फ़न का भी होता अगर ,
   हम भी होते तुम्हारी तरह नामवर ॥
   दर से मेरे ग़रीबी उठी तो मगर ,
   दीनो - ईमान रखकर के इक ताक पर ॥
   जब थे बीमार कोई न आया कभी ,
   हैं जनाज़े में शामिल कई डॉक्टर ॥
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (05-03-2014) को माते मत वाले मगर, नेता नातेदार-चर्चा मंच 1542 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
धन्यवाद ! मयंक जी !

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