120 : मुक्त-ग़ज़ल - दिल जब भी मोहब्बत में............



दिल जब भी मोहब्बत में गिरफ्र्तार हुआ है ॥
नुकसान कुछ न कुछ हरेक बार हुआ है ॥
देखे है जात-पाँत-मज़हब-ऊँच-नीच जो ,
वो प्यार नहीं प्यार का व्यापार हुआ है ॥
कहते वो बहुत कुछ हैं बहुत ठीक भी मगर ,
कहने ही भर से तो न पर-उपकार हुआ है ॥
आसानियों से अपने सब होशो-हवास में ,
सच खोलने न हर कोई तैयार हुआ है ॥
इतने ही ग़म से हाल है बेहाल क्या करूँ ?
दिल रंजो-ग़म से आज ही दो-चार हुआ है ॥
दरिया में डालने को कौन नेकियाँ करे ?
ये सिर्फ़ फ़सानों में चमत्कार हुआ है ॥
सच क्या है ? रात-दिन इसी को ढूँढता भटके ,
पढ़-पढ़ के और ज़्यादा वो बेकार हुआ है ॥
मजबूर होके आदमी से माँग रहा हूँ ,
मेरे लिए फ़िलहाल रब बेकार हुआ है ॥
इक मैं ही न ख़ुदगर्ज़ हूँ दुनिया-जहान में ,
मतलब परस्त सारा ही संसार हुआ है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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