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गीत : बला की तू तो ख़ूबसूरत है.......

बला की तू तो ख़ूबसूरत है II ख़ुदा क़सम ख़ुदा की मूरत है II बला की तू......................... ख़ुदा क़सम....................... ज़मीं के चाँद से ऊपर का चाँद शर्माए , तू शाम आई सरेबाम चाँद क्यों आए ? गुलाब ख़ुश था की वैसा ज़मीं पे फूल नहीं , तेरे हसीन रू को देख रो पड़ा हाए II बला की तू......................... ख़ुदा क़सम....................... रहे न और किसी का तेरा ही हो जाए II जो करले दीद तेरा तो उसी में खो जाए II तेरी निगाहे करम का हो कौन बेपर्वा ? है कौन जो तेरे इनकार से न रो जाए ? बला की तू......................... ख़ुदा क़सम....................... है बेमिसाल तुझसा दूसरा जमाल नहीं II असर से तेरे बड़ा दूसरा कमाल नहीं II है तुझमें शर्म जो छुईमुई में भी वो क्या होगी ? हया की तुझसे जहाँ में बड़ी मिसाल नहीं II बला की तू......................... ख़ुदा क़सम....................... -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

देवी गीत ....... तेरे दर्शन को आना चाहूँ

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तेरे दर्शन को आना चाहूँ पर आऊँगा मैं कैसे माँ ? पग जाते रहे दोनों मेरे चल पाऊँगा मैं कैसे माँ ? तेरे दर्शन को आना चाहूँ.................................? हाथों में शंख चक्र साजै मुखड़े पर तेज रहे पावन , सुनता बस आया हूँ तेरा है रूप बड़ा ही मनभावन , अब नयनहीन दर्शन तेरे कर पाऊँगा मैं कैसे माँ ? पग जाते रहे दोनों मेरे चल पाऊँगा मैं कैसे माँ ? तेरे दर्शन को आना चाहूँ.................................? सज्जन दुर्जन कोई भी हो जो भी जाये तेरे द्वारे , हर ले झट सबके कष्ट करे कल्याण सभी का तू तारे , दरबार में तेरे पहुँचे बिन तर पाउँगा मैं कैसे माँ ? पग जाते रहे दोनों मेरे चल पाऊँगा मैं कैसे माँ ? तेरे दर्शन को आना चाहूँ.................................? है शक्ति तेरी भक्ति में बड़ी ध्यानू की लाज धरी तूने , गदगद हो वीर शिवाजी को अविजित तलवार वरी तूने , बिन तुझको प्रसन्न किये मन के वर पाउँगा मैं कैसे माँ ? पग जाते रहे दोनों मेरे चल पाऊँगा मैं कैसे माँ ? तेरे दर्शन को आना चाहूँ.................................?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

126 : मुक्त-ग़ज़ल - पहले सी हममें तुममें..............

पहले सी हममें तुममें मोहब्बत न अब रही II इक दूसरे की दिल में वो इज्ज़त न अब रही II गिन्नी में औ’’ दीनार में तुलते थे पहले हम , धेले की कौड़ी भर की भी क़ीमत न अब रही II इक दूसरे के बिन कभी रहना न था मुमकिन , इक दूसरे की कोई ज़रूरत न अब रही II मुद्दत से सो रहे हैं काँटों , पत्थरों पे हम , मखमल के बिस्तरों की वो आदत न अब रही II इतना किया है हमने मुश्किलों का सामना , कोई भी मुसीबत हमें आफ़त न अब रही II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 515 - सच में ऐसे सम्हाल.............

सच में 
ऐसे सम्हाल कर रक्खे ,  जाँ के 
जैसे सम्हाल कर रक्खे , हमने सब 
तेरे तोहफ़े अब तक I तूने 
कैसे सम्हाल कर रक्खे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 514 - इश्क़ में जाने कैसे-कैसे............

इश्क़ में जाने कैसे-कैसे 
पापड़ बेले हैं II शादी के तो बाद और भी 
विकट झमेले हैं II पहले लगता था कि अकेलापन 
इक बड़ी सज़ा है , अब लगता है हमसे बेहतर 
निपट अकेले हैं II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 513 - दुनिया न सही गाँव.................

दुनिया न सही गाँव-
नगर होता तेरा मैं II आशिक़ न सही दोस्त ही 
अगर होता तेरा मैं II रहती तसल्ली कुछ जो तुझसे
 रहती निस्बतें , दुश्मन ही सही कुछ तो 
मगर होता तेरा मैं II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

125 : मुक्त-ग़ज़ल - लेकर के अपने साथ..............

लेकर के अपने साथ तेज़-तुंद हवाएँII सूरज के रिश्तेदार चिराग़ों को बुझाएँII ख़्वाबीदा आदमी तो आप उठ ही जायेगा , आँखें जो खोल सोये उनको कैसे जगाएँ ? मंदिर का हर इक शख्स कलश बनने को तैयार , बुनियाद के पत्थर के लिए किसको मनाएँ ? कितना अज़ीज़ हो कोई उसकी भी घर में लाश , रखता न कोई दफ्न करें सब या जलाएँII महँगी से महँगी भी शराब मुफ़्त क्यों न हो , समझें जो हराम इसको कभी मुँह न लगाएँII ख़ूब आज़माया अपना असर लाके रही हैं , अपनों की बद्दुआएँ औ’ग़ैरों की दुआएँII

*मुक्त-मुक्तक : 512 - कोई हू-ब-हू तो.................

कोई हू-ब-हू तो 
कोई टुक जुदा है II सभी का ख़ुदा ख़ास-
ओ-अलहदा है II ये सोचूँ कि ज्यों तेरा 
मेरा है क्या यूँ ही , सबके ख़ुदा का भी 
होता ख़ुदा है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्त ग़ज़ल : 124 - रोते-रोते हो गईं जब मुद्दतें..........

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रोते-रोते हो गईं जब मुद्दतें II तब लगाईं हमने हँसने की लतें II कुछ को मिल जाता है सब कुछ मुफ़्त में , कुछ को कुछ मिलता न भर-भर क़ीमतें II एक जैसी हरक़तों के बावजूद , कुछ को मिलते नर्क कुछ को जन्नतें II देखकर मंजिल पे लंगड़ों की पहुँच , पैर वाले कर रहे हैं हैरतें II उनकी खोटी ही रही नीयत सदा , पर खरी उनको मिलीं सब बरक़तेंII पहले थीं चोरों से गुण्डों से मगर , अब पुलिस से हो रही हैं दहशतें II -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

मुक्त ग़ज़ल : 123 - सोचा न था वक़्त आयेगा............

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सोचा न था वक़्त आयेगा ऐसा ख़राब भी ॥ खाएँगे पण्डे गोश्त पियेंगे शराब भी वो जो किया करते थे गुसल दूध दही से , आज उनको न दो घूँट मयस्सर है आब भी मिलते नहीं हैं उनको फूल कागज़ी भी आज , रौंदे थे जिनने कल जुही-चम्पे-गुलाब भी कुछ ब्योरे करेंगे तलब सुई के , बूँद के , कुछ लेंगे न तलवार औ’’नदी के हिसाब भी॥ क़ुदरत का निजाम अब तो आदमी सा हो गया , सहरा में बरसते नहीं काले सहाब भी है ज़िन्दगी

*मुक्त-मुक्तक : 511 - जैसे कि दे के दीद..................

जैसे कि दे के दीद यकायक क़रीब से बख्शी मिरी इन आँखों को जन्नत नसीब से वैसे ही नज्र कर दो अपनी दौलते दिल भी , बन जाऊँ मैं अमीर प्यार का ग़रीब से -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 510 - कह पाओ रू-ब-रू न...................

कह पाओ रू-ब-रू न 
नाजुक-ओ-नरम दिल के II संगदिल भी जिनको पढ़के 
हो जाएँ रहम दिल के II पैग़ामे मोहब्बत वो 
भेज ऐसे कबूतर से , क़रतास पे वो कर सब 
जज़्बात रक़म दिल के II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 509 - तुझसे तो शर्तिया थी...............

तुझसे तो शर्तिया थी उम्मीदे वफ़ा मगर II औरों से भी तू बढ़के निकला बेवफ़ा मगर II ग़ैरों से दग़ाबाज़ियाँ तो आम बात थी , अपनों से भी तू कर सका न रे वफ़ा मगर II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 508 - कल तक न आये थे................

कल तक न आये थे मगर हम आज दोस्तों , आये हैं ऐसे दोस्तों से बाज़ दोस्तों II लेते न हाथों हाथ न सर पर बिठाते जो , करते नहीं जो हमपे फ़ख्रो-नाज़ दोस्तों II -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

122 : मुक्त-ग़ज़ल - मुँह बनाकर मत उन्हें कुछ................

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मुँह बनाकर मत उन्हें कुछ      मुस्कुराकर देखना ॥      अपने रूठों को किसी दिन 
    यूँ मनाकर देखना ॥      हमने माना कि तेरे 
    हम्माम का सानी नहीं ,     फिर भी इक दिन खुल के बारिश 
    में नहाकर देखना ॥      वो तुझे बेज़ायका 
    लगता है उसको इक दफ़ा ,     सिर्फ़ तगड़ी भूख लगने 
    पर तू खाकर देखना ॥      गोश्त हड्डीदार तू 
    हलुए सरीखा चाब ले ,     एक रूखी-सूखी रोटी 
    भी चबाकर देखना ॥      घंटों जिम में वेटलिफ्टिंग 
    तू किया करता है रोज़ ,     एक दिन परिवार का 
    ज़िम्मा उठाकर देखना ॥      टूट पड़ते फाकाकश को 
    देख जूठन पे न हँस ,     एक दिन तू निर्जला 
    चुपके बिताकर देखना ॥      -डॉ. हीरालाल प्रजापति

121( ¡¡ ) : मुक्त-ग़ज़ल - मत और किसी के खेल..................

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मत और किसी के खेल संग में तो मानूँ होली !! तू मुझको भिगो मैं तुझको रंग में तो मानूँ होली !! मैं तुझको भरे बैठा हूँ कबसे ठूँस-ठूँस मन में , तू मुझको भरे जब हृदय अंग में तो मानूँ होली !! मैं राह कोई भी अपनाऊँ पाने की तुझे सजनी , सब वैध रहें यदि प्रेम-जंग में तो मानूँ होली !! लिख लाख पत्र पे पत्र किन्तु जो अभिवान्छित मुझको , लिखे तू अनंग लेख इक उमंग में तो मानूँ होली !! पीते हैं तेरे हाथों से सदा पर प्यार भी दे अपना , यदि घोंट-घोंट कर आज भंग में तो मानूँ होली !! -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 507 - ऊँट पर भी बैठ जो................

ऊँट पर भी बैठ जो बाज़ार जायें हम IIकाटने कुत्ते वहाँ भी पहुँचें दम के दम IIइस क़दर दुश्मन हमारे हो गए यारों ,तोहफ़े खोलें तो लगता है न निकलें बम II-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 506 - हर किसी पे उसका दिल.............

हर किसी पे उसका दिल हारा नज़र आया ॥ इश्क़ का बीमार और मारा नज़र आया ॥ जब उसे देखा था पहले पहल वैसा ही , तर-ब-तर ग़म से वो दोबारा नज़र आया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 505 - चीज़ों की तरह रखते हैं............

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चीज़ों की तरह रखते हैं सब मुझको उठाकर ॥ बिन हाथ-पैर कैसे कहीं जाऊँ मैं आकर ? इतना ग़रीब इतना-इतना-इतना ग़रीब हूँ , देते हैं भिकारी भी भीक मुझको बुलाकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 504 - पाँव की तह की ज़मीं.............

पाँव की तह की ज़मीं 
और न सर की छत या छाँव ॥ मुल्क़ लगते हैं नहीं 
लगते सूबे , शहर या गाँव ॥ इसका चस्का है ख़तरनाक 
कोई खेले फिर , छोटे-मोटे नहीं 
चलते हैं सियासत में दाँव ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति