कविता : कैसे सिगरेट अब जलाएंगे ?


वाँ तो दिन पे भी ढेर सूरज हैं ,
और याँ शब पे इक चिराग़ नहीं ।
याँ पे भूखे भी लोग मर जाएँ ,
और वाँ जह्र फाँक झाग नहीं !
मुझको ज़िंदा ही फूँक पछताएँ ,
कैसे सिगरेट अब जलाएंगे ?
राख़ ठोकर से खूर गुस्साएँ ,
इसमें अब कोई आग-वाग नहीं ॥
सात पर्दों में असली सूरत रख ,
तुम ज़माने में हो ख़ुदा बजते ,
लाख चेहरे हैं एक चेहरे पर ,
इक भी चेहरे पे कोई दाग़ नहीं !!
सच कहूँ तो ज़ुबाँ का हूँ कड़वा ,
मीठा बोलूँ तो चापलूस तभी
रेंकनें-भौंकने का आदी मैं ,
कूकने का गले में राग नहीं ॥    
सबको अपना सा क्यों समझते हो ?
क्या मज़ेदार बात करते हो ?
मुझसे आसाँ सवाल बच्चों से !
सोचते होगे याँ दिमाग़ नहीं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

yashoda agrawal said…
आपकी लिखी रचना शनिवार 15/02/2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
कृपया पधारें ....धन्यवाद!
धन्यवाद ! yashoda agrawal जी !
wah bhai bahut sundar ....aabhar apka .
धन्यवाद ! Naveen Mani Tripathi जी !
Aditi Poonam said…
बहुत बढ़िया....धन्यवाद ......
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आपने चित्र कमाल के रहते हैं अलग सबसे इस बार भी कुछ यूँ ही है
धन्यवाद ! Lekhika 'Pari M Shlok' जी !

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