*मुक्त-मुक्तक : 491 - है गर तवील ज़िंदगी...............


है गर तवील ज़िंदगी की तुझको सच में चाह ॥
दूँगा मैं तुझको सिर्फ़ोसिर्फ़ एक ही सलाह ॥
है क्योंकि तू औलादे हरिश्चंद्र इसलिए ,
मत सुर्ख़ को कहना तू सुर्ख़,स्याह को न स्याह ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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