*मुक्त-मुक्तक : 488 - मुस्तक़िल जेह्नोदिल में................


मुस्तक़िल जेह्नोदिल में 
आन बसा जा न सका ॥
वो स्वाद हमने चखा 
जिसका मज़ा जा न सका ॥
दोबारा हो न सका 
हाय मयस्सर वो मगर ,
शराबे वस्ल का ताउम्र 
नशा जा न सका ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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