*मुक्त-मुक्तक : 486 - पहले के जितने भी थे................


पहले के जितने भी थे वो सारे ही अब बंद ॥ 
इश्क़-मुहब्बत फ़रमाने वाले छुईमुई ढब बंद ॥ 
क्या चुंबन क्या आलिंगन सब व्रीड़ा हीन करो ,
शर्म-हया-संकोच-लाज-लज्जा-लिहाज सब बंद ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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