*मुक्त-मुक्तक 485 - इक बूँद भर से कलकल.............


इक बूँद भर से कलकल 
आबे चनाब होकर ॥
भर दोपहर का ज़र्रे से 
आफ़्ताब होकर ॥
अपने लिए तो जैसा हूँ 
ठीक हूँ किसी को ,
दिखलाना चाहता हूँ 
मैं कामयाब होकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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