*मुक्त-मुक्तक : 483 - मुसाफ़िर कोई................


मुसाफ़िर कोई हमसफ़र चाहता है ॥
सड़क के किनारे शजर चाहता है ॥
कि जैसे हो तितली को गुल की तमन्ना ,
मुझे भी कोई इस क़दर चाहता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म