*मुक्त-मुक्तक : 479 - नाम-ए-इश्क़ हो...............


नाम-ए-इश्क़ हो सरनाम न बदनाम बने ॥
आबे ज़मज़म रहे , न मैक़दे का जाम बने ॥
सख़्त पाबन्दियाँ हों पेश इश्क़बाज़ी पे ,
सात पर्दों की बात इरादतन न आम बने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

shashi purwar said…
waah bahut khoob sundar muqtak badhai

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