*मुक्त-मुक्तक : 478 - मुक्त मन से बन सँवर कर............


मुक्त मन से बन सँवर कर पूर्णतः वह धज्ज थी ॥
मुझसे सब इच्छाओं को सट मानने झट सज्ज थी ॥
केलि के उपरांत आभासित हुआ वह त्यागिनी ,
अप्रतिम सुंदर मनोहर भर थी पर निर्लज्ज थी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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