*मुक्त-मुक्तक : 476 - सारे कंकड़ वो...............


सारे कंकड़ वो बेशक़ीमती नगीने सा ॥
सब ही पतझड़ वही बसंत के महीने सा ॥
दुनिया गर एक खौफ़नाक दरिया तूफ़ानी ,
वो,लगाता जो पार लगता उस सफ़ीने सा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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