*मुक्त-मुक्तक : 472 - क़तरा-क़तरा तेरी................


क़तरा-क़तरा तेरी यादों में आँखों ने ढाया ॥
अश्क़ जब ख़त्म हो गए तो खूँ भी छलकाया ॥
राह देखी कुछ ऐसी तेरी दम-ए-आख़िर तक ,
पलकों को मरके भी खुल्ला रखा न झपकाया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Harsh Tripathi said…
WAH .........WAH .LAAJAWAAB
धन्यवाद ! Harsh Tripathi जी !

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