*मुक्त-मुक्तक : 471 - ज़िंदगी को इस क़दर..............


ज़िंदगी को इस क़दर सर्दी हुई है ,
फ़ौर लाज़िम मौत की गर्मी हुई है ॥
थक गई चल-चल,खड़े रह-रह के अब बस ,
बैठने दरकार झट कुर्सी हुई है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे