*मुक्त-मुक्तक : 470 - जी करता है अपने सर से.............


जी करता है अपने सर से पटक गिराऊँ मैं !
अपने हल्केपन का कब तक बोझ उठाऊँ मैं ?
ख़ूब रहा गुमनाम कभी बदनाम भी बहुत हुआ ,
अब सोचूँ कुछ यादगार कर नाम कमाऊँ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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