*मुक्त-मुक्तक : 469 - क्या सोच के ये गबरू.............


क्या सोच के ये गबरू-गबरू नौजवाँ करें ?
होशियार से होशियार भी नादानियाँ करें ॥
दोनों तरफ़ लगी हो आग कब ये देखते ?
इकतरफ़ा इश्क़ में भी क़ुर्बाँ अपनी जाँ करें ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा