*मुक्त-मुक्तक : 467 - कोई हमराह नहीं कोई............


कोई हमराह नहीं कोई क़ाफ़िला न रहा ॥
मिलने-जुलने का कहीं कोई सिलसिला न रहा ॥
मुझको हैरत है फिर भी ऐसी बदनसीबी से ,
कोई ख़फ़गी न रही कोई भी गिला न रहा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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