*मुक्त-मुक्तक : 466 - न सुनहरा स्वप्न बुनती..............


न सुनहरा स्वप्न बुनती न व्यथित होती ॥
न निरंतर जागती न अनवरत सोती ॥
आग मन की अश्रु जल से यदि बुझा करती ,
देखती कम आँख निःसंदेह बस रोती ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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