*मुक्त-मुक्तक : 465 - अंदर थार मरुस्थल................


अंदर थार मरुस्थल बाहर हिन्द महासागर सा तृप्त ॥
सूट-बूट में लगता ज्ञानी-चतुर-चपल पर है विक्षिप्त ॥
कितने अवसर पुण्य कमाने के मिलते हैं किन्तु त्वरित-
लाभ हेतु रहता मानव प्रायः लघु-महा पाप संलिप्त ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Harsh Tripathi said…
VERY NICE ; VOICING OUT THE TRUTH

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

सिर काटेंगे