*मुक्त-मुक्तक : 463 - हैं इस क़दर ग़लीज़..................


हैं इस क़दर ग़लीज़ कि गंगा न धो सके ॥
बोझिल हैं इतने धरती भी उनको न ढो सके ॥
वो ख़ुद भी आरज़ू-ए-क़ज़ा रखते है लेकिन ,
सब में तो माद्दा-ए-ख़ुदकुशी न हो सके ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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