119 : मुक्त-ग़ज़ल - जबकि दिल आ गया.............


जबकि दिल आ गया किसी पर है ॥
कैसे कह दूँ कि हाल बेहतर है ?
तू किसी और से ये मत कहना ,
हालाँकि मामला उजागर है ॥
उसने सौ बार कह दिया तो क्या ?
वो ग़लत और ग़लत सरासर है ॥
आँख क्यों ख़ुद ब ख़ुद न झुक जाये ,
सामने शर्मनाक मंजर है ॥
मुझसे पूछो न आशिक़ी क्या है ?
कैसे बोलूँगा दर्दे सर भर है ?
काम दमकल का बाल्टी से करूँ ,
हाय जो जल रहा मेरा घर है ॥
नींद आये मगर न आयेगी ,
जिसपे लेते हैं खुदरा पत्थर है ॥
ये नहीं के वो मुझसे बेहतर है ,
हाँ ! किसी तरह बहुत ऊपर है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (24-02-2014) को "खूबसूरत सफ़र" (चर्चा मंच-1533) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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