118 : मुक्त-ग़ज़ल - मुझे दोस्तों से मिला..............


मुझे दोस्तों से मिला न तू , मुझे दुश्मनी का शौक़ है ॥
मुझे प्यार से तू देख मत , मुझे बेरुख़ी का शौक़ है ॥
मुझे इंतिहा में न बाँध तू , मुझे हद से बाहर जाने दे ,
मुझे मत ख़ुदा का दे वास्ता , मुझे काफ़िरी का शौक़ है ॥
मुझे हर तरफ़ दिखता है ख़ालिस स्याह और बस स्याह ही ,
मुझे रौशनी नहीं चाहिए , मुझे तीरगी का शौक़ है ॥
मुझे कह लो तुम खुदगर्ज़ या बड़े शौक़ से मतलब परस्त ,
मुझे लेकिन अपने काम से बस काम ही का शौक़ है ॥
मेरी ज़िंदगी का जो हाल हो , मुझे फिर भी अपनी सर क़सम ,
दुश्वार है तो भी क्या हुआ ? इसी ज़िंदगी का शौक़ है ॥
किसे यह नहीं होता पता कि शराब कैसी चीज़ है ?
करे क्या मगर जिसे रात-दिन बस मैकशी का शौक़ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (22-02-2014) को "दुआओं का असर होता है" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1531 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
prritiy----sneh said…
kavyatmak prastuti

shbuhkamnayen
धन्यवाद ! prritiy----sneh जी !

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