117 : मुक्त-ग़ज़ल - शायद उसके जैसा इस...............


शायद उस सा इस दुनिया में कोई और नहीं ॥
सबके अपने-अपने छत हैं उसका ठौर नहीं ॥
डाकू , चोर , लुटेरों की दुनिया में नहीं कमी ,
लेकिन चित्त चुराने वाला माखन–चोर नहीं ॥
ज़र , ज़मीन , इंसान , जानवर सचमुच फ़लक तलक ,
सब क़ाबू में कर लोगे पर दिल पर ज़ोर नहीं ॥
उसको छोटे-छोटे कीट-पतंगे साफ़ दिखें ,
हम जैसों पर उसकी नज़रें करती ग़ौर नहीं ॥
मनवा कर रहता अपनी हर बात ज़माने से ,
एक हुक़्मराँ है वो चाहे सिर पर मोर नहीं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (16-02-2014) को वही वो हैं वही हम हैं...रविवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1525 में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

खूबसूरत शब्द चित्र उकेरा है लीलापुरुष का ,त्रिभंगी का। …।
धन्यवाद ! Virendra Kumar Sharma जी !

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